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NEW DELHI :- सिविल प्रक्रिया संहिता की रूपरेखा ,

                                                                             सिविल प्रक्रिया संहिता सभी सिविल वादों को सुलझाने के लिए बनाई गई है जो संपूर्ण भारतवर्ष में एक समान रूप से लागू होती है सिविल प्रक्रिया संहिता में प्रारंभ में एक प्रस्तावना दी गई है जो इस प्रकार है “यह अधिनियम सिविल न्यायालय की प्रक्रिया संबंधी विधि को समेकित एवं संशोधित करने के लिए अधिनियमित किया जाता है”

इस अधिनियम की प्रारंभिक के अनुसार अधिनियम का उद्देश्य सिविल न्यायलयों की प्रक्रिया से संबंधित विधियों का समेकन एवं संशोधन करना है

प्रस्तावना में समेकन शब्द का प्रयोग करके यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है कि सिविल प्रक्रिया संहिता में सभी विधियों एकत्रित कर लिया है परंतु धारा 158 में अंतर्निर्हित शक्ति का प्रयोग न्यायालय को अधिभावी बनाता है इसके अतिरिक्त हिंदू विधियां एवं उत्तराधिकार अधिनियम इस बात को स्पष्ट करते है कि संहिता समेकित नहीं है इन बातों से स्पष्ट होता है कि जिन विधियों का उल्लेख संहिता में है उनके लिए संहिता पूर्ण है एवं अन्य विधियों के लिये पूर्ण नहीं है

सिविल प्रक्रिया से संबंधित प्रथम एकीकृत कोर्ट का सफल प्रयास 1859 में किया गया था परंतु ये प्रेसिडेंसी क्षेत्रों पर लागू नहीं था इस कमी को पूरा करने के लिए एक संहिता 1877 में पुनः बनाई गई परंतु उसमें भी काफी कमियां थी वर्तमान संहिता का निर्माण 1908 में किया गया था संहिता को समीचीन बनाने के लिए इसमें मुख्य संशोधन 1951 1956 1977 1999 और 2002 में किए गए हैं

सिविल प्रक्रिया संहिता दो भागों में बांटी गई
संहिता के प्रथम भाग में 158 धाराएं हैं जो कि सिविल न्यायालयों की प्रक्रियाओं से संबंधित है यह सारभूत अधिकारों को स्पष्ट करती है

संहिता का द्वितीय भाग अनुसूची 1 है जिसमें 1 से लेकर 51 तक आदेश है इन आदेशों में उन नियमों को वर्णित किया गया है जिनके आधार पर प्रथम भाग के सिद्धांतों को क्रियात्मक रूप से लागू कराया जा सकता है

संहिता के द्वितीय भाग अर्थात नियमों को हाई कोर्ट द्वारा परिवर्तित करके संशोधित किया जा सकता है नियमों को संशोधित करने कि सीमाए निम्न शर्तों के अधीन होगी

संशोधन किए जाने पर राज्य सरकार का अनुमोदन होना चाहिए उसी में ही उस स्थिति में ही संशोधन मान्य होंगे

धारा 126 के अनुसार ,यदि किसी क्षेत्र में न्यायालय स्थित नहीं है ऐसी स्थिति में केंद्र सरकार की अनुमति आवश्यक मानी जाएगी

धारा 127 के अनुसार ,संशोधित नियमों को राजपत्र में प्रकाशित किया जाएगा

धारा 18 के अनुसार, नियमों को उस हद तक ही संशोधित किया जाएगा कि वह मूल सिद्धांतो से असंगत ना हों

उत्तर प्रदेश राज्य बनाम बाबू राम 1980 1SSC 198 के मामले में कहा गया कि नियम व धाराओं में विरोध होने पर धाराओं का प्रभाव होगा और नियम अप्रभावी होंगे

उत्तर प्रदेश राज्य बनाम चंद्रभूषण ए आई आर 1961 सुप्रीम कोर्ट 751 ,के बाद में कहा गया कि हाईकोर्ट द्वारा बनाए गए नियम या संशोधित किए गए नियमों को संहिता का भाग माना जाएगा

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