क्लासिफिकेशन ऑफ़ मैरिज इन हिंदू लॉ
विवाह मानव सभ्यता की नींव विवाह से रखी जाती है विवाह होने के बाद मानव को सामाजिक रूप प्रदान होता है
हिंदू संस्कृति में विवाह सर्वाधिक सुदृढ़ एवं संस्कारी माना जाता है विवाह मनुष्य को सामाजिक एवं धार्मिक रूप प्रदान करता है
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार,
यज्ञव्लक्या के अनुसार, स्त्री माता एवं पिता बनने के लिए उत्पन्न किए गए हैं इसी से मनुष्य का वंश आगे बढ़ता है

मनु के अनुसार,पूर्ण पुरुष वो ही है जो विवाह करता है एवं जिसकी संतान आगे बढ़ती है

महाभारत के अनुसार, पत्नी अर्धांगिनी है पुरुष के द्वारा किए गए धार्मिक अनुष्ठान बिना पत्नी अधूरे हैं पत्नी पति की आत्मा है पत्नी पति की सबसे अच्छी मित्र है धार्मिक अर्थ काम एवं मोक्ष का एकमात्र स्रोत पत्नी है

हिंदू विवाह की 8 विधियां है इसको दो भागों में विभाजित किया जा सकता है मान्य एवं आमन्य विधियां

1.मान्य विधियां
2.अमान्य विधियां

1.ब्रम्हा विवाह,
यह सभी विधियों का सर्वोत्तम विवाह माना जाता है इस विवाह में कन्या का पिता वर की पूजा कर कन्या को दान देकर कन्यादान करता है

 

2.दैव विवाह
यज्ञ में कन्यादान यह विधि 1955 के बाद प्रचलन में आई है

3.प्रजापत्या विवाह
कन्या को सहधर्मांतरण करने के कन्या के लिये कहना एवं कन्या को वर को सौंपना प्रजापत्या विवाह माना जाता है कन्या का पिता कहता है कि तुम साथ-साथ धर्म आचरण करो और कन्या का हाथ वर के हाथ में सौंप देता है

4.आर्य विवाह
धार्मिक कर्तव्य के निर्वहन हेतु को गौमिथुन लेकर कन्या को वर को सौंप दिया जाता है सामान्य शब्दों में कहा जाए तो दिखा दो गाय या एक गाय एक बेल लेकर पिता अपनी कन्या को वर को सौंप देता है

2.अमान्य विवाह

1.गन्धर्व विवाह

किसी कन्या द्वारा इच्छीच पुरुष से विवाह जो पूर्णता वासना है एक गन्धर्व विवाह माना जाता है इस प्रकार के विवाह किसी धार्मिक कृत्य के प्रेम विवाह की तरह किए जाते हैं

2.असुर विवाह
विवाह में कन्या का पिता वर से अपनी कन्या का मूल्य शुल्क के रूप में प्राप्त करके कन्या को वर को सौंप देता है

3. राक्षस विवाह
इस विवाह में वर कन्या का अपहरण करके लाता है और कन्या के घर में तोड़ फोड़ करता है कन्या को अपने साथ ले आता है

4. पेशच विवाह
इस विवाह में वर मत्त,पागल या सोई हुई कन्या के साथ संभोग करता है

द्वितीय वर्गीकरण

अनुलोम विवाह , इस विवाह में उच्चजाति के वर एवं निम्न जाति की कन्या होती है धार्मिक ग्रंथ यज्ञवाल्कय एवं मिताक्षरा के अनुसार ऐसे विवाह को मान्य विवाह माना जाता था
गुलावती बनाम जीवनलाल ए.आई.आर 1922 बॉम्बे 25 इस मामले में इस विवाह को वैध ठहराया गया था

प्रतिलोम विवाह

इस विवाह में कन्या उच्चजाति एवं वर निम्नजाति का होता था ऐसे विवाह को मान्य विवाह नहीं माना जाता था परंतु पूर्व काल में ऐसे विवाह मान्य थे समय के साथ जाति प्रथा कठोर होने के बाद ऐसे विवाहों को अवैध घोषित करके समाप्त कर दिया गया

तृतीय वर्गीकरण

वर्तमान समय में हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के द्वारा पुराने वर्गीकरण को समाप्त करके उन्हें निम्नलिखित तीन वर्गों में विभाजित किया गया है

1.मान्य विवाह
2.शून्यकारणीय विवाह
3.शून्य विवाह

1.मान्य विवाह ऐसा विवाह है जिससे सभी रस्मों रिवाजों को पूर्ण रूप से पूरा किया जाता है एवं जो विधि पूर्ण मान्य है वर्तमान समय में यह विवाह मान्य विवाह माना जाता है

2.शून्यकारणीय विवाह यह एक मान्य विवाह है जब तक एक पक्ष कार द्वारा इस विवाह को सुनिए शून्यकारणीयहोने के लिए न्यायालय में आवेदन नहीं किया जाता है न्यायालय चाहे तो ऐसे विवाह को शून्य विवाह घोषित कर सकता है

3.शून्य विवाह को हिंदू विवाह अधिनियम 1955 द्वारा विभाजित नहीं किया गया है इस विवाह को किसी भी विधि से मान्यता प्राप्त नहीं है इस विवाह में पक्षो को पति पत्नी की हैसियत से नहीं देखा जाता है

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.