न्यायिक अभिरक्षा क्या है?

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किसी अभियुक्त की रिमांड ख़त्म हो जाने पर मजिस्ट्रेट द्वारा मामले की गंभीरता को देखते हुए अभियुक्त को न्यायिक हिरासत (न्यायिक अभिरक्षा)में भेजा जा सकता है न्यायिक अभिरक्षा के दौरान अभियुक्त के अपराध की रिपोर्ट बना कर पुलिस को न्यायालय में पेश करना रहता है

जब अपराध मृत्यु आजीवन कारावास या दस वर्ष से अन्यून अवधि के कारावास से दंडनीय हो और जब अपराधी किसी अन्य अवधि के कारावास से दण्डनीय हो तब कुल मिलाकर 60 दिन की अवधि का किया जएगा |

जब अपराध मृत्यु आजीवन कारावास या दस वर्ष के कारावास से दण्डनीये है तब न्यायिक हिरासत की अवधि 90 दिन या किसी अन्य अवधि के कारावास से दंडनीय तब न्यायिक हिरासत को अवधि 60 दिन होगी |

सवाल उठता है क्या 15 दिन से अधिक की रिमांड पर अभियुक्त को भेजा जा सकता है हाँ, 15 दिन से अधिक दिनों की रिमांड पर भेजा जा सकता है यदि मजिस्ट्रेट की जाँच या विचारण की अधिकारिता नहीं है तो वह दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 167 (2) के अनुसार रिमांड पर नहीं भेजा सकता है |

यदि किसी अभियुक्त को नियत अवधि के भीतर आरोप पत्र प्रस्तुत ना किये जाने के कारण ज़मानत पर छोड़ दिया जाता है तब यह समझा जाएगा कि धारा 437 के आधार पर अभियुक्त की ज़मानत हुई है |

यदि ज़मानत के लिये आवेदन आरोप प्रस्तुत किये जाने से पहले किया गया है तो ज़मानत मंजूर की जा सकती है

किसी अभियुक्त को अभिरक्षा में रखने के तीन अवसर होते है –
प्रथम चौबीस घंटे – इसमें पुलिस को पूरी स्वतन्त्रत है कि वह अभियुक्त को कहाँ कहाँ रखना या ले जाए |

इसके पश्चात् पंद्रहा दिन इसके लिये मजिस्ट्रेट के समक्ष रिमांड के लिये पेश किया जाता है सामान्य पंद्रहा दिन की रिमांड मजिस्ट्रेट करते रहते है |

पंद्रहा दिन से अधिक 60 दिन रिमांड करने पर मजिस्ट्रेट को कारण प्रस्तुत करना होगा |

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