भारतीय दंड संहिता धारा 19 से धारा 22 भाग 3

SAJMA ALI

NEW DELHI :-धारा 19. भारतीय दंड संहिता की धारा 19 न्यायाधीश को परिभाषित करती है न्यायाधीश ऐसा कोई भी व्यक्ति हो सकता है जिस व्यक्ति को प्राधिकृत रूप से न्यायाधीश पद का नाम दिया गया है इसमें प्रत्येक ऐसे व्यक्ति सम्मिलित है जिसे आपराधिक सिविल एवं राजस्व कार्यवाही करने कि शक्ति प्राप्त है और जिसे निश्चयात्मक निर्णय देने के सक्षम माना गया है

धारा 20. भारतीय दंड संहिता की धारा 20 न्यायालय को परिभाषित करती है कि न्यायालय ऐसा स्थान जहां न्यायिक कार्य को करने के लिए संरक्षित किया गया है अथवा ऐसा स्थान जिनको न्यायिक कार्यो के लिए सशक्त किया गया हो

धारा 21. भारतीय दंड संहिता की धारा 21 लोक सेवक को परिभाषित करती है सामान्यता लोकसेवक ऐसा व्यक्ति होता है जो लोग कर्तव्यों का निर्वहन करता है परन्तु सभी शासकीय कर्मचारी लोकसेवक नहीं होते हैं
निम्नलिखित व्यक्तियों को लोक सेवक माना गया है

  • किसी राज्य का मुख्यमंत्री एवं मंत्री गण
  • सरपंच
  • नगर पालिका समिति का अध्यक्ष
  • नगर पालिका द्वारा नियुक्त संग्रह करता
  • पंजीकृत सहकारी समिति का कर्मचारी अथवा कार्यपालिका समिति का सदस्य
  • अध्यापक अध्यापक जिससेसरकार से वेतन मिलता है
  • रेलवे कर्मचारी
  • सहायक वायु सेवा का सदस्य

एम. करुणानिधि बनाम भारत संघ ए.आई.आर 1977 SC इस वाद में कहा गया कि मुख्यमंत्री को लोक सेवक की श्रेणी में रखा जाएगा

आर.एस.नायक बनाम ए.आर.अंतुले ए.आई.आर 1984 इस वाद में सुप्रीम कोर्ट द्वारा यह निर्धारित किया गया कि एमएलए विधायक को लोक सेवक की श्रेणी में नहीं रखा जाएगा

धारा 22 .भारतीय दंड संहिता की धारा 22 चल(जंगम) संपत्ति को परिभाषित करती है इसके अंतर्गत हर प्रकार की संपत्ति है जो स्वतंत्र हो जो जमीन या किसी अन्य चीज से जुड़ी ना हो

किंतु जो संपत्ति भूमि से जुड़ी है वह अचल संपत्ति के अंतर्गत आती है
चल संपत्ति एवं अचल संपत्ति को विस्तृत रूप से संपत्ति अंतरण अधिनियम 1882 में परिभाषित किया गया है

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