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NEW DELHI :- सिविल प्रकृति से पीड़ित प्रत्येक व्यक्ति को उपचार हेतु न्यायालय में वाद दायर करने का अधिकार है वादों को प्रकृति विषय वस्तु एवं विवाद की प्रकृति के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है
सिविल प्रक्रिया की धारा 15 -20 वादों को संस्थित करने वाले प्रावधानों का उल्लेख किया गया है जो यह दर्शित करता है कि वाद कहाँ संस्थित किया जाएगा

सर्वप्रथम निम्नतम न्यायालय की श्रेणी में वाद को संस्थित किया जाएगा जो उस मामले का विचारण करने के लिए सक्षम है धारा 15 इस नियम एवं प्रक्रिया का प्रावधान करती है

निम्नतर श्रेणी के न्यायालय में वाद को प्रस्तुत करने का उद्देश्य पक्षकारों को सुविधा प्रदान करना है एवं उच्च न्यायालय को वादों के बोझ से बचाना है

निम्नतर श्रेणी के न्यायालय की सक्षमता वाद की विषय वस्तु, उनके मूल्यांकन के आधार पर निश्चित की जाती है यदि इसके विरुद्ध डिक्री पारित की जाती है तो वह आकृति एवं शून्य होगी

सामान्यता वाद के मूल्यांकन के आधार पर ही आर्थिक क्षेत्राधिकार निर्धारित किया जाता है यदि वादी अपने वाद का कम एवं अधिक मूल्यांकन करता है तो वह अनुचित होगा ऐसे मामलों में न्यायालय का कर्तव्य है कि वे संहिता के आदेश 7 नियम 11 के अंतर्गत वाद के उचित मूल्यांकन के साथ ही समुचित न्यायालय में प्रस्तुत करने का आदेश दें न्यायालय वादी को यह आदेश भी दे सकता है कि वह वाद के मूल्यांकन को सत्य सिद्ध करें

यदि प्रतिवादी द्वारा आर्थिक क्षेत्राधिकार संबंधी आपत्ति उठाई जाती है तब न्यायालय का यह कर्तव्य होता है कि वे उचित रूप से जांच पड़ताल करके समुचित आदेश पारित करें

आर्थिक क्षेत्राधिकार संबंधी अपील एवं पुनरीक्षण न्यायालय के समक्ष सीधे नहीं उठाई जा सकती है अपील या पुनरीक्षण के दौरान ऐसी अपत्तियों पर न्यायालय तभी विचार करेगा जबकि ऐसी आपत्ति प्रथम न्यायालय में सुलभ अवसर पर नहीं उठाई गई हो एवं इसके कारण न्यायालय की विफलता नहीं हुई हो

वादों का वहां संस्थित किया जाना जहां विषय वस्तु स्थित है
सिविल प्रक्रिया संहिता धारा 16 यह प्रावधान करती है कि वाद वहां संस्थित किया जाएगा जहाँ वाद की विषय वस्तु स्थित है जैसे

  • स्थावर संपत्ति के प्राप्ति के लिए
  • स्थावर संपत्ति के विभाजन के लिए
  • स्थावर संपत्ति के पुरोबंध के लिए
  • स्थावर संपत्ति के अधिकार के लिए. आदि

इस धारा में वर्णित संपत्ति का अर्थ उस संपत्ति से है जो भारत में स्थित है

सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 17 अभिनिर्धारित करती है कि जब कोई सम्पत्ति दो न्यायालयों की सीमा में स्थित है तब दोनों में से किसी भी न्यायालय में वाद को संस्थित किया जा सकता है,

सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 18 अभिनिर्धारित करती है कि यदि विवादित संपत्ति दो न्यायालयों की अनिश्चित सीमा में स्थित है और किसी न्यायालय द्वारा संपत्ति के वाद को ग्रहण कर लिया जाता है अनिश्चितता के भाव के कारण को अभिलिखित करेगा एवं उस न्यायालय द्वारा पारित डिक्री को वही प्रभाव लागू होगा मानों वह संपत्ति उस न्यायालय की सीमा में स्थित है

यदि वाद शारीरिक या जंगम सम्पत्ति के विरुद्ध प्रतिकर के लिए संस्थित किया जाता है तब वादी के विकल्प पर वाद को संस्थित किया जा सकता है

  • जहां वादी निवास करता है
  • जहां वादी कारोबार करता है

दृष्टांत (क) जो दिल्ली का निवासी है (ख)कलकत्ता में पीटता है ख या तो दिल्ली या कलकत्ता दोनों में से किसी भी जगह वाद ला सकता है

उपरोक्त से स्पष्ट है कि वाद को वहां संस्थित किया जाएगा जहां वादी या वाद की विषय वस्तु स्थिति हो चाहे प्रतिवादी हो या कोई विवादित संपत्ति |

ACCORDING TO CODE 

Place of suing

15. Court in which suits to be instituted .-Every suit shall be instituted in the Court of the lowest grade competent to try it.

16. Suits to be instituted where subject-matter situate .-Subject to the pecuniary or other limitations prescribed by any law, suits-

(a) for the recovery of immovable property with or without rent or profits,

(b) for the partition of immovable property,

(c) for foreclosure, sale or redemption in the case of a mortgage of or charge upon immovable property,

(d) for the determination of any other right to or interest in immovable property,

(e) for compensation for wrong to immovable property,

(f) for the recovery of movable property actually under distraint or attachment, shall be instituted in the Court within the local limits of whose jurisdiction the property is situate:

Provided that a suit to obtain relief respecting, or compensation for wrong to, immovable property held by or on behalf of the defendant may, where the relief sought can be entirely obtained through his personal obedience, be instituted either in the Court within the local limits of whose jurisdiction the property is situate, or in the Court within the local limits of whose jurisdiction the defendant actually and voluntarily resides, or carries on business, or personally works for gain.

Explanation .-In this section “property” means property situate in [India].

17. Suits for immovable property situate within jurisdiction of different Courts .-Where a suit is to obtain relief respecting, or compensation for wrong to, immovable property situate within the jurisdiction of different Courts, the suit may be instituted in any Court within the local limits of whose jurisdiction any portion of the property is situate:

Provided that, in respect of the value of the subject-matter of the suit, the entire claim is cognizable by such Court.

18. Place of institution of suit where local limits of jurisdiction of Courts are uncertain .-(1) Where it is alleged to be uncertain within the local limits of the jurisdiction of which of two or more Courts any immovable property is situate, any one of those Courts may, if satisfied that there is ground for the alleged uncertainty, record a statement to that effect and thereupon proceed to entertain and dispose of any suit relating to that property, and its decree in the suit shall have the same effect as if the property were situate within the local limits of its jurisdiction:

Provided that the suit is one with respect to which the Court is competent as regards the nature and value of the suit to exercise jurisdiction.

(2) Where a statement has not been recorded under sub-section (1), and an objection is taken before an Appellate or Revisional Court that a decree or order in a suit relating to such property was made by a Court not having jurisdiction where the property is situate, the Appellate or Revisional Court shall not allow the objection unless in its opinion there was, at the time of the institution of the suit, no reasonable ground for uncertainty as to the Court having jurisdiction with respect thereto and there has been a consequent failure of justice.

19. Suits for compensation for wrongs to person or movables .-Where a suit is for compensation for wrong done to the person or to movable property, if the wrong was done within the local limits of the jurisdiction of one Court and the defendant resides, or carries on business, or personally works for gain, within the local limits of the jurisdiction of another Court, the suit may be instituted at the option of the plaintiff in either of the said Courts.

20. Other suits to be instituted where defendants reside or cause of, action arises .-Subject to the limitations aforesaid, every suit shall be instituted in a Court within the local limits of whose jurisdiction-

(a) the defendant, or each of the defendants where there are more than one, at the time of the commencement of the suit, actually and voluntarily resides, or carries on business, or personally works for gain; or

(b) any of the defendants, where there are more than one, at the time of the commencement of the suit, actually and voluntarily resides, or carries on business, or personally works for gain, provided that in such case either the leave of the Court is given, or the defendants who do not reside, or carry on business, or personally work for gain, as aforesaid, acquiesce in such institution; or

(c) the cause of action, wholly or in part, arises.

[* * * *]

[ Explanation ].-A corporation shall be deemed to carry on business at its sole or principal office in [India] or, in respect of any cause of action arising at any place where it has also a subordinate office, at such place.

 

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