ज़मानत का रद्दीकरण

IQBAL

NEW DELHI:-भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता में जमानत रद्द करने के उपबंध निम्न धाराओं में 436 (2) 437 (5) 439 (2) 446 (क ) में दिए गए हैं जिसमें ज़मानत का रद्दीकरण किया जा सकता है

जमानत पाना प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार है जमानत जमानतीय अपराधों में अधिकार के तहत एवं अजमानतीय अपराधों में न्यायालय के स्व विवेक पर निर्भर रहती है

न्यायाधीश सभी परिस्थितियों और अपराधी की प्रकृति को देखते हुए जमानत मंजूर करता है ज़मानत लेते समय न्यायालय अभियुक्त पर कुछ शर्तों को अधिरोपित करता है यदि अभियुक्त के द्वारा शर्तों का अनुपालन नहीं किया जाता है तब न्यायालय के द्वारा जमानत को रद्द कर दिया जाता है

जमानत रद्द किए जाने के उपबंध विधि के अनुसार इस प्रकार व्याख्या करते हैं

शर्तों का अनुपालन नहीं करना -धारा 436 (2) के अनुसार जब किसी व्यक्ति को जमानती अपराध में पुलिस अधिकारी द्वारा गिरफ्तार किया जाता है न्यायालय द्वारा उस व्यक्ति को जमानत लिए जाते समय कुछ शर्तों को अधिरोपित किया जाता है यदि उन शर्तों का अनुपालन अभियुक्त द्वारा नहीं किया जाता है तब उस अभियुक्त की हाजिरी के समय न्यायालय चाहे तो ज़मानत रद्द कर सकता है और अभियुक्त को अभिरक्षा में भेज सकता है

436(2) Notwithstanding anything contained in sub- section (1), where a person has failed to comply with the conditions of the bail- bond as regards the time and place of attendance, the Court may refuse to release him on bail, when on a subsequent occasion in the same case he appears before the Court or is brought in custody and any such refusal shall be without prejudice to the powers of the Court to call upon any person bound by such bond to pay the penalty thereof under section 446.

 

अपराध की गंभीरता एवं पूर्व दोषसद्धि धारा 437 (5) के अनुसार यदि अभियुक्त के द्वारा अजमानती अपराध किया गया है न्यायालय को लगता है कि जांच या विचारण के समय गायब हो सकता है वह पूर्व में संज्ञय अपराधों में दोषसिद्ध किया जा चुका है जिनकी सजा 3 वर्ष से अधिक है यदि न्यायालय द्वारा न्याययोचित समझते हुए जमानत पर छोड़ दिया जाता है तब यदि न्यायालय को लगे की जमानत का रद्द किया जाना उचित तब यदि हाजिरी के दौरान या अन्य दशाओं में अभिरक्षा में लेने का आदेश दे सकता है

437(5)Any Court which has released a person on bail under sub- section (1) or sub- section (2), may, if it considers it necessary so to do, direct that such person be arrested and commit him to custody.

उच्च या सेशन न्यायालय की जमानत रद्द करने की शक्ति धारा 439 (2) के अनुसार यदि किसी व्यक्ति पर 7 वर्ष या उससे अधिक अवधि के कारावास का अभियोग है तो उस अभियुक्त को उच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय द्वारा जमानत पर कुछ शर्तों अधिरोपित करने के बाद छोड़ दिया जाता है यदि ऐसा व्यक्ति शर्तों का अनुपालन नहीं करता है या फिर से अपराधों में संतलिप्त रहता है तब न्यायालय उस व्यक्ति की जमानत को रद्द करके अभिरक्षा में लेने का आदेश दे सकता है

439(2)A High Court or Court of Session may direct that any person who has been released on bail under this Chapter be arrested and commit him to custody.

हाजिर ना होने पर जमानत का रद्दी करण धारा 446( क) अनुसार न्यायालय के द्वारा न्यायालय में हाजरी के लिए बंधपत्र लिया जाता है यदि अभियुक्त के द्वारा बंधपत्रों का अनुपालन नहीं किया जाता है तो ऐसी स्थिति में न्यायालय के द्वारा जमानत हो रद्द कर दिया जाता है

446A. Cancellation of bond and bail- bond. Without prejudice to the provisions of section 446, where a bond under this Code is for appearance of a person in a case and it is forfeited for breach of a condition-

(a) the bond executed by such person as well as the bond, if any, executed by one or more of his sureties in that case shall stand cancelled; and
(b) thereafter no such person shall be released only on his own bond in that case, if the Police Officer or the Court, as the case may be, for appearance before whom the bond was executed, is satisfied that there was no sufficient cause for the failure of the person bound by the bond to comply with its condition: Provided that subject to any other provision of this Code he may be released in that case upon the execution of a fresh personal bond for such sum of money and bond by one or more of such sureties as the Police Officer or the Court, as the case may be, thinks sufficient.]

सबंधित वाद

महबूब दाऊद शेख बनाम महाराष्ट्र राज्य 2004 सुप्रीम कोर्ट इस वाद में पुलिस अधिकारी द्वारा न्यायालय में शपथ पत्र दाखिल किया गया जिसमें अपीलार्थी को धमकी दिया जाना उपदर्शित था तथा भारतीय दंड संहिता की धारा 188 के अधीन मामला दर्ज किया गया था अपीलार्थी के द्वारा जमानत रद्द करने के लिए निवेदन किया गया अभियुक्त न्यायालय को उचित लगा तब न्यायालय ने अभियुक्त की जमानत को इस आधार पर रद्द कर दिया कि अभियुक्त व्यक्ति द्वारा विचारणीय या जांच में बाधा आ सकती है या साक्षियों को धमकाया जा सकता है

Leave a Reply

Your email address will not be published.