न्यायिक सेवा मुख्य परीक्षा टेस्ट सीरीज टेस्ट 4 एडवोकेट हिमानी शर्मा ,जुडीशल अस्पिरेट्स के द्वारा लिखा हुआ प्रश्न 2.  का उत्तर पढ़ें और कमेंट करें

प्रश्न 2.  व्यपहरण  एवं अपहरण के अपराधों के मध्य अंतर स्पष्ट कीजिए ? (300  शब्द)

उत्तर. भारतीय दंड संहिता 1860की धारा 359 में व्यपहरण एवं धारा 362 में अपहरण के बारे में बताया गया है।

धारा 369-  व्यपहरण – व्यपहरण दो प्रकार का होता है ।

1.भारत में से व्यपहरणधारा 360

2.कानूनी संरक्षता में से व्यपहरण – धारा 361

व्यपहरण का शाब्दिक अर्थ है-  बालचोरी

धारा 360-  भारत में  से व्यपहरण – जो कोई किसी व्यक्ति को-

1.उस व्यक्ति की सहमति के बिना, या

2.उस व्यक्ति की ओर से सहमति देने के लिए कानूनी रूप से अधिकृत किसी व्यक्ति की सहमति के बिना,  भारत की सीमाओं से बाहर ले जाता है उसके बारे में यह माना जाता है कि वह भारत में से उस व्यक्ति का व्यपहरण करता है ।

धारा 361- कानूनी संरक्षकता में से व्यपहरण

एक व्यक्ति कानूनी संरक्षकता में से व्यपहरण करता  हुआ कहा जाता है, जब वह –

(1)16 वर्ष से कम आयु के नर को

(2)18 वर्ष से कम आयु की नारी को, या

(3)किसी विकृतचित् व्यक्ति को

उनके कानूनी संरक्षक की  संरक्षकता में से  ऐसे संरक्षक की सहमति के बिना “ले जाता है”या “फुसलाकर ले जाता है”।

धारा 362. अपहरण-

कोई व्यक्ति अपहरण करता हुआ तब माना जाता है जबकि वह किसी व्यक्ति को किसी स्थान से ले जाने के लिए-

1.बलपूर्वक विवश करता है , या

 2.छल पूर्वक उपायों से प्रेरित करता है।

धारा 362 में अपहरण को  परिभाषित किया गया है। इस धारा के अंतर्गत अपहरण मूल अपराध नहीं है, बल्कि एक सहायक कार्य है जो  स्वत:  दंडनीय नहीं है। अपहरण तभी आपराधिक होता है जब इसे किसी आपराधिक आशय से किया गया हो।

 व्यपहरण तथा अपहरण में अंतर-

1.व्यपहरण का अपराध केवल 16 वर्ष से कम आयु के बालक या 18 वर्ष से कम आयु की बालिका अथवा किसी विकृतचित  व्यक्ति के संबंध में ही किया जा सकता है,जबकि अपहरण का अपराध किसी भी आयु के व्यक्ति के साथ किया जा सकता है।

2.व्यपहरण के अंतर्गत किसी व्यक्ति को उसके विधि पूर्ण संरक्षक की संरक्षकता से हटाया जाता है,अतः बिना संरक्षक के बालक को “ले जाना”या “बहकाने “मात्र से अपहरण का अपराध घटित नहीं होता जबकि अपहरण में  व्यक्ति का किसी की संरक्षकता में  होना जरूरी नहीं है।

3.व्यपहरण में संरक्षक का बहुत महत्व है, क्योंकि कानूनी संरक्षण में से ही व्यपहरण किया जाता है,जबकि अपहरण में संरक्षक का होना महत्वहीन है, अपहरण पूर्णत:उसी व्यक्ति से संबंधित होता है जिसका अपहरण किया जाता है।

4.व्यपहरण के अपराध के गठन के लिए प्रभावित व्यक्ति की सहमति महत्वहीन है, जबकि अपहरण में सहमति बिना दबाव के दी गई है तो वह अपराध को समाप्त कर देती है।

5.व्यपहरण में व्यपहरणकर्ता के आशय का कोई महत्व नहीं होता, जबकि अपहरण में अपहरणकर्ता का आशय इस अपराध के लिए जरूरी है, क्योंकि अपहरण अपने आप में कोई अपराध नहीं है, यह तभी अपराध होता है जब इसे किसी विशिष्ट आशिया से किया जाए।

6.व्यपहरण के अपराध के गठन के लिए केवल प्रभावित व्यक्ति का “ले जाया जाना “मात्र ही काफी है, जबकि अपहरण के गठन के लिए प्रभावित व्यक्ति को बल या छल द्वारा ले जाया जाना जरूरी है।

7. व्यपहरण कोई अनवरत अपराध नहीं है, क्योंकि यह उसी समय पूरा हो जाता है जिस समय किसी व्यक्ति को विधि पूर्ण सरंक्षता से वंचित किया जाता है, जबकि अपहरण का अपराध एक अनवरत या निरंतर चालू रहने वाला अपराध है जब तक गतिमान रहता है तब तक अपहृत व्यक्ति को एक से दूसरे स्थान पर लाया जाता है।

8. व्यपहरण एक मौलिक अपराध है, जबकि अपहरण स्वत: दंडनीय नहीं है किंतु जब वह धारा 364-369 में दिए गए उद्देश्यों में से किसी उद्देश्य से किया जाता है तब वह आपराधिक बन जाता है।

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