New Delhi :- न्यायिक सेवा मुख्य परीक्षा टेस्ट सीरीज टेस्ट 5, एडवोकेट यशिका सोनी जुडीशल अस्पिरेट्स के द्वारा लिखा हुआ उत्तर पढ़ें और कमेंट करें

प्रश्न .1 चोरी की परिभाषा जो भारतीय दंड संहिता की धारा 378 में दी गई है उसका विश्लेषण कीजिए

चोरी की परिभाषा भारतीय दंड संहिता की धारा 378 में दी गई है जो निम्न प्रकार है
चोरी (धारा-378)जो किसी व्यक्ति के कब्जे में से उस व्यक्ति की सम्मिति के बिना कोई जंगम संपत्ति बेईमानी से लेने का आशय रखते हुए वह संपत्ति लेने के लिए हटाता है वे चोरी करता है यह कहा जाता है

स्पष्टीकरण 1- जब तक कोई वस्तु भूमिबद्ध रहती है जंगम संपत्ति ना होने से चोरी का विषय नहीं होती किंतु जुयूँ ही वह भूमि से पृथक हो जाती है वे चोरी का विषय योग्य हो जाती है

स्पष्टीकरण 2- हटाना जो उसी कार्य द्वारा किया गया है जिससे पृथक्करण किया गया है चोरी हो सकेगा

स्पष्टीकरण 3 – कोई व्यक्ति किसी चीज का हटाना कार्य करता है यह तब कहा जाता है जब वे उस बाधा को हटाता है जो उस चीज को हटाने से रुके हुए हो या जब वे उस चीज को किसी दूसरी चीज से पृथक करता है तथा जब वे वास्तव में उसे हटाता है

स्पष्टीकरण 4 – वह व्यक्ति जो किसी साधन द्वारा किसी जीव जंतु का हटाना कारित करता है उस जीव जंतु को हटाता है यह कहा जाता है और वह ऐसी हर चीज को हटाता है जो इस प्रकार उत्पन्न की गई है गति के परिणाम स्वरुप जीव जंतु द्वारा हटाई जाती है

स्पष्टीकरण 5- परिभाषा में वर्णित सम्मिति अभिव्यक्ति या विवाक्षित हो सकती है और वह या तो कब्ज़ा रखने वाले व्यक्ति द्वारा या किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा प्रयोजन के लिए अभिव्यक्ति अधिकार रखता है दी जा सकती है

परिभाषा और उसके स्पष्टीकरण 5 से कुछ प्रमुख तथ्य निकलते हैं जो किसी वस्तु को लेने के आशय या लेने को चोरी के अपराध में परिवर्तित करते हैं और वे चोरी कही जाती है यह तथ्य निम्न प्रकार है

1.सम्पत्ति को बेईमानी से लेने का आशय
2.सम्पत्ति चल हो
3.सम्पत्ति को दूसरे व्यक्ति के कब्जे में से लिया जाए सम्पत्ति को दूसरे 4.व्यक्ति की सम्मिति के लिए बिना लिया जाए

5.सम्पत्ति को लेने के लिए उसे उसके स्थान से कुछ दूर हटाया जाए

सम्पत्ति को बेईमानी से लेने का आशय
आशय ही चोरी के अपराध का मूल तत्व है सम्पत्ति लेने का आशय बेईमानी पूर्ण होना चाहिए और इसका उस समय चोरी करते समय इसी रूप में विद्यमान देना आवश्यक है जिस समय संपत्ति हटाई जा रही है

नोट – बेईमानी की परिभाषा धारा 24 भारतीय दंड संहिता में इस प्रकार है, जो कोई इस आशय से कोई कार्य करता है कि एक व्यक्ति को सदोष अभिलाभ कारित करें या अन्य को सदोष हानि कारित करें वह उस कार्य को बेईमानी से करता है यह कहा जाता है

सदोष हानि (सदोष लाभ की धारा 23 में और जंगम संपत्ति को धारा 22 आईपीसी 1860 में परिभाषित किया गया है )

यह आवश्यक नहीं है कि संपत्ति स्थाई रूप से ली गई हो या अपनाने के आते से ली गई हो चोरी संपत्ति के स्वामी को संपत्ति से स्थाई रूप से वंचित न करने के आशय से भी कारित की जा सकती है

उदाहरण – अ अपने घर में अपनी घड़ी भूल गया जो ब को मिली उस घड़ी को तुरंत अ को लुटाने के बजाय उसे अपने घर ले गया और उसे तब तक अपने पास रखा जब तक की वह अ से पैसे इनाम के रूप में प्राप्त नहीं कर लेता है ब इस धारा के अंतर्गत दंडनीय है

अपवाद – किसी वास्तविक विवाद को शुद्ध करने हेतु संपत्ति लेने यदि कोई संपत्ति को ऐसे विवाद के संदर्भ में हटाया जा रहा है जिससे कि वादी का वाद सुदृढ़ हो जाए तो संपत्ति का हटाया जाना इस धारा के अंतर्गत चोरी नहीं होगा भले ही की गई मांग उपयुक्त आधारों पर आधारित ना हो

भूल – यदि कोई विधि की भूल तथा तथ्य की भूल के अंतर्गत ऐसा विश्वास करता है कि संपत्ति को लेने का अधिकार रखता है तो वह भूल नहीं है

चल संपत्ति – चोरी का दूसरा महत्वपूर्ण विश्लेषण यह है कि संपत्ति चल होनी चाहिए अचल संपत्ति चुराई नहीं जा सकती इसलिए संपत्ति चल संपत्ति होनी चाहिए तथा एक स्थान से दूसरे स्थान पर लाइए या ले जाए जा सके

सम्पत्ति को किसी के कब्जे से लिया जाए

संपत्ति अभियोजन के अधिपत्य में होना अनिवार्य है अधिपत्य स्वामी के रूप में हो सकता है या अन्यथा जंगली पशु कभी भी चोरी की विषय वस्तु नहीं हो सकते जबकि पालतू जानवर चिड़िया मछलियां की जा सकती है

बिना सहमति के लेना – चोरी का अपराध घटित करने के लिए यह आवश्यक है कि संपत्ति उस व्यक्ति की सहमति के बिना ली गई हो जिसके कब्जे में थी

उदहारण – क जो य का मित्र है य की अनुपस्थिति में प के पुस्तकालय में जाता है और प की अभिव्यक्ति सम्मिति के बिना पुस्तक को पढ़ने के लिए और वापस करने के आशय से ले जाता है यहां यह भी संभव है कि क ने यह विचार किया हो की पुस्तक उपयोग में लेने के लिए उसको या की विवाक्षित प्राप्त है यदि क का यह विचार था तो क ने चोरी का अपराध नहीं किया है

संपत्ति का हटाया जाना – जैसे ही कोई बेईमानी पूर्ण आशय से संपत्ति को हटाया जाता है यह अपराध पूर्ण हो जाता है संपत्ति का उसके स्थान से रंच मात्र हटाया जाना चोरी का अपराध घटित कर देता है भले ही हटाने के पश्चात संपत्ति को बहुत दूर ना ले जाया गया हो

स्पष्टीकरण 3 और 4 यह दोनों स्पष्टीकरण संपत्ति हटाने जाने के विभिन्न प्रकारों से संबंधित है

स्पष्टीकरण 3 कहता है
1.वस्तु को वास्तव में हटाकर
2.किसी अन्य वस्तु से पृथक कर तथा
3.उस बाधा को हटाकर जिसके द्वारा वस्तु के हटाए जाने को पारित किया गया था

स्पष्टीकरण 4- जीव जंतुओं को हटाने की बात करता है जो इस प्रकार उत्पन्न की गई गति के परिणाम स्वरूप जी द्वारा हटाई जाती है

चोरी के लिए दंड का प्रावधान धारा 379 में किया गया है जिसमें किसी भी भांति के कारावास जिसकी अवधि 3 वर्ष की हो सकेगी या जुर्माना या दोनों से दंडित किया जाएगा

 

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