समन मामले के विचारण में जो प्रक्रिया मजिस्ट्रेट द्वारा अपनाई जानी चाहिए उसका संक्षिप्त विवरण दीजिए

समन मामलों के विचारण में मजिस्ट्रेट द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया दंड प्रक्रिया संहिता 1973 का अध्याय 20 मजिस्ट्रेट द्वारा समन मामलों के विचारण की प्रक्रिया के बारे में प्रावधान करता है जो की धारा 251 से 259 तक वर्णित है

धारा 251 अभियोग का सारांश जाना समन मामलों में जब अभियुक्त स्वम् मजिस्ट्रेट के सामने आता है या पुलिस अधिकारी द्वारा लाया जाता है तो मजिस्ट्रेट का कर्तव्य
उसे अपराध की विशेषता बताना जिसका उस पर आरोप लगाया गया है मजिस्ट्रेट उसे यह पूछेगा कि क्या वे अपने आप को दोषी होना स्वीकार करता है
या बचाव करना चाहता है

धारा 252 दोषी होने के अभिभावक पर दोष सिद्धि इस धारा के अनुसार यदि अभियुक्त दोषी होना स्वीकार करता है तब मजिस्ट्रेट उसके कथन को रिपोर्ट रिकॉर्ड करेगा अभियुक्त के ही शब्दों में
और अपनी विवेकशक्ति का प्रयोग करके उसे दोष सिद्ध कर सकेगा

धारा 253 छोटे तुच्छ मामलों में अभियुक्त की अनुपस्थिति में दोषी होने के अभिभावक पर दोषसिद्धि

जहाँ कोई समन अंडर सेक्शन 206 के तहत जारी किया जाता है और अभियुक्त स्वीकार भी कर रहा है कि हां मैं दोषी हूं मगर वे मजिस्ट्रेट के सामने नहीं आना चाहता है

तो अभियुक्त या तो स्वयं या अपने अधिवक्ता द्वारा

मजिस्ट्रेट को पत्र लिखेगा अपने दोषी होने के कथन का और
समन के साथ जुर्माना भी देगा जो भी निर्धारित हो डांक द्वारा

मजिस्ट्रेट अपनी विवेक शक्ति का का प्रयोग करके उसके दोषी होने के कथन और उसकी अनुपस्थिति में ही उसे दोष सिद्ध कर सकेगा

समन में वर्णित जुर्माना देने के लिए दण्डा देश देगा आदेश देगा और अभियुक्त के द्वारा भेजी गई रकम जुर्माने में जोड़ दी जाएगी

धारा 254 प्रक्रिया एवं दोषसिद्व न किया जाये

1) यदि मजिस्ट्रेट अभियुक्तों को धारा 252 याद धारा 253 के अधीन दोषी सिद्ध नहीं करता है तो वह अभियोजन को सुनने के लिए और सब ऐसा साक्ष्य जो वे अपनी प्रतिरक्षा में पेश करे लेने के अग्रसर होगा

2) यदि मजिस्ट्रेट अभियोजन अभियुक्त के आवेदन पर ठीक समझता है तो वह किसी साक्षी को हाजिर होने या कोई दस्तावेज या अन्य की पेश करने का निदेश देने वाला समन जारी कर सकता है

3) मजिस्ट्रेट ऐसा आवेदन पर किसी साक्षी को समन करने के पूर्व यह उपेक्षा कर सकता है कि विचारण के प्रयोजन के लिए हाजिर होने में लिए किए जाने वाले उसके उचित व्यय न्यायालय में जमा कर दिये जाएं

अंडर सेक्शन 253 दोस्ती किया जाए तो आगे की कार्यवाही मजिस्ट्रेट दोनों को सुनवाई का अवसर देगा दोनों पक्षों द्वारा पेश किया जाएगा अभियुक्त अभियुक्त के आवेदन पर किसी गवाह को उपस्थित होने कोई दस्तावेज पेश होने के लिए बुलाया जाएगा जारी करने से पहले पक्षकार को गवाह को उपस्थिति करने में जो भी खर्चा होगा उसे जमा करने का आदेश दे सकेगा

धारा 255 दोषमुक्ति या दोषसिद्धि
1) यदि धारा 254 के तहत सभी तरह का साक्ष्य लेने पर मजिस्ट्रेट को यह लगता है कि दोषी नहीं है तो उसे दोषमुक्ति का आदेश दे सकेगा

2) यदि मजिस्ट्रेट को लगे कि वे दोषी है और धारा 325, 300 के तहत कोई कार्यवाही नहीं की गई है तो विधि अनुसार दण्डदेश दे सकेगा

3) मजिस्ट्रेट को धारा 252 व 255 के तहत कर सकता है यदि ऐसा दण्डादेश है जो पास होना चाहिए तो कर सकेगा,

ऐसा अपराध के लिए
– जो खुद स्वीकार कर लिया गया है
– सबूत द्वारा पेश किया गया है

चाहे परिवाद समन सा प्रतीत ही क्यों ना हो

धारा 256 परिवादी का हाजिर ना होना या उसकी मृत्यु

जब परिवादी नियत तिथि पर उपस्थित नहीं हो तब मजिस्ट्रेट द्वारा आगे की कार्यवाही

1) सुनवाई को आगे के लिये स्थागित सकेगा
अभियुक्त के दोष मुक्त या घोषित सकेगा

लेकिन जहां परिवादी का प्रतिनिधित्व अधिवक्ता या अभियोजन अधिकारी द्वारा संचालन किया जा रहा है या
मजिस्ट्रेट को लगता है कि परिवादी की उपस्थिति आवश्यक नहीं है तो वहां मजिस्ट्रेट उसे हाजरी से मुक्ति भी दे सकता है और मामले में आगे की कार्यवाही कर सकता है

धारा 257 परिवाद को वापस लेना

परिवादी किसी मामले में अंतिम आदेश से पहले परिवाद को वापस ले सकेगा

जब मजिस्ट्रेट को संतुष्ट कर दे कि पर्याप्त आधार है
तो अभियुक्त को दोषमुक्त किया जाएगा जिसके विरुद्ध परिवाद किया गया था

नोट अंडर सेक्शन 257 केवल समन मामलों पर ही लागू होता है

धारा 258 कुछ मामलों में कार्यवाही रोकने की शक्ति :-

परिवाद से अलग संक्षिप्त किसी संबंध मामले में कोई न्यायिक जुडिशल मजिस्ट्रेट
1)प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट
2)मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति से

ऐसे कारणों से जो अभी लिखित होंगे

1) दोषसिद्ध दोषमुक्ति का नियुक्त सुनाएं बिना कार्यवाही को किसी भी पप्रक्रम पर रोक लगा सकेगा

2) दो साथियों के साथ को रिकॉर्ड करने के बाद कार्यवाही रोकी जाती है तो दोषमुक्ति का निर्णय सुना सकेगा

किसी अन्य अभियुक्तों को डिस्चार्ज या उचित कर दिया जाना

धारा 259 समन मामलों को वारंट मामलों में बदलने की शक्ति
शर्ते :-
1) वह समन मामला हो
2) 6 माह से अधिक अवधि के करावास का प्रवधान हो
3) न्याय हित में होना जरूरी हो

अगर यह शर्ते पूरी होती है तो मजिस्ट्रेट किसी समन मामले को वारंट मामले में बदल सकता है

नोट : इस धारा के अधीन किसी समन मामले को वारंट मामले में तब्दील किया जाता है तो उस मामले की सुनवाई फिर से शुरुआती सिरे से की जानी आवशयक है

समन मामला और वारंट मामले में अंतर बताइये

समन मामला धारा 2(ब )

1) समन मामले में 2 वर्ष तक के कारावास का दंड दिया जा सकता है जबकि

वारंट मामले में मृत्यु,आजीवन कारावास व 2 वर्ष से अधिक कारावास का दंड दिया जा सकता है

2) अभियुक्त को दोषीसिद्ध या दोषमुक्त करने के लिए संक्षिप्त प्रक्रिया अपनाई जा सकती है जबकि

संक्षिप्त प्रक्रिया नहीं अपनाई जाती है

3) समन मामले का प्रारंभ अभियुक्त को कथन को लिपिबद्ध किए जाने पर होता है और कथन के इनकार कर देने पर अभियोजन पक्ष का साक्ष्य दिया जाता है जबकि

वारंट मामले का प्रारंभ अभियुक्त के आशय से होता है इसके बाद अभियुक्त के कथन को लिपिबद्ध किया जाता है

4) परिवादी न्यायालय की अनुमति से परिवाद वापस ले सकता है जबकि

परिवार वापस लेने की अनुमति नहीं दी जाती है

5) समन मामलों में अभियुक्त को दोषीसिद्ध या दोषमुक्त किया जा सकता है जबकि

वारंट मामलों में दोषीसिद्ध या दोष मुक्ति के अलावा उनमोचन का भी आदेश दिया जा सकता है

6) समन मामला एक बार समाप्त हो जाने पर पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता है जबकि

वारंट मामले में अभियुक्त को उचित किए जाने पर मामले को पुनर्जीवित किया जा सकता है251

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