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Hindu law

हिंदू विवाह संस्कार है या संविदा स्पष्ट करें!

हिंदू विवाह की प्रकृति एवं इसकी विशेषताएं

हिंदू विवाह को सोलह संस्कारों में सबसे महत्वपूर्ण एवं पवित्र माना जाता है इसीलिए विवाह को स्थाई अखंडनीय एवं जन्म जन्मांतर का संबंध माना जाता है पत्नी को अर्धांगिनी एवं धर्मपत्नी कहा गया है जिसके बिना पुरुष अपूर्ण रहता है

मुख्य मामला :- मनमोहन बनाम वसंतकुमारी 1909 कोलकाता हाई कोर्ट इस मामले में विवाह को हड्डी एवं मास का मिलन बताया गया है महाभारत में कहा गया है कि पत्नी पुरुष की आत्मा है

विवाह संस्कार क्यों है

1.स्वर्ग की प्राप्ति के लिए
2.पितृऋण से मुक्ति तभी मिल सकती है जब पुत्र को जन्म दिया जाए
3.धार्मिक अनुष्ठान के लिए
4.अटूट एवं जन्मों जन्मांतरण का संबंध

हिन्दू विवाह संविदा की प्रकृति का नहीं होता है क्योंकि संविदा के लिए जिन तीन अनिवार्य तत्वों प्रस्ताव स्वीकृति प्रतिफल की आवश्यकता होती है हिंदू विवाह में इन तीनों तत्वों का अभाव होता है कन्या का पिता स्वेच्छा से वर को कन्यादान में देता है कन्यादान के बदले में कोई प्रतिफल नहीं लेता है हिंदू विवाह इस कारण भी संविदा नहीं कहा जा सकता क्योंकि संविदा के लिए पक्षकरों का व्यस्क एवं स्वस्थ मस्तिष्क का होना आवश्यक है जबकि हिन्दू विवाह में पक्षकार अवयस्क भी हो सकता है

हिंदू विवाह संविदा है
वर्तमान में हिंदू विवाह 1955 के अधिनियमित होने के बाद संविदा के कुछ तत्व परिलक्षित होते हुए दिखाई देते हैं
1.विवाह की अकृतता (inutility)
2.न्यायिक पृथक्करण एवं तलाक
3.परस्परिक सहमति से विवाह विच्छेद
4.जारता का एक ही कृत्य होना पर्याप्त है

धारा 5 (3 ) के अनुसार विवाह पक्षकार कन्या 18 वर्ष एवं वर 21 वर्ष यह सक्षमता को व्यक्त करती है इससे कन्यादान की प्रथा गौण हो गई तथा कन्या को स्वम् विवाह करने की प्रेरणा मिल जाती है एवं इस प्रकार से संविदा का तत्व प्रतीत होता है

हिंदू विवाह का वर्तमान स्वरूप

विभिन्न अधिनियम द्वारा हिंदू विवाह के संस्कारिक स्वरूप को परिवर्तित कर दिया गया है हिंदू विवाह अधिनियम 1955 का हिंदू विवाह पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ा है

विवाह के संस्कारी स्वरूप पर प्रभाव पड़ा है तथा इसमें संविदा के अनेक लक्षण सम्मिलित हो गए हैं इसके बाद व्यवहारिक विधि कोने में हिंदुओं के संदर्भ में प्रभावित किया गया है

1.एक विवाह को मान्यता
2.विवाह विच्छेद का उपबंध
3.अंतरजातीय विवाह को मान्यता
4.विवाह की शर्तों का सरलीकरण
5.नए अनुतोष जैसे दान पत्रों का अधिकार,विवाह विच्छेद, न्यायिक 6.पृथक्करण,पुनर्स्थापना,भरण पोषण
7.शून्य एवं शून्यकरण विवाह से उत्पन्न संतान की वैधता
8.विवाह विच्छेद के बाद संतानों का भरण पोषण
9.विवाह की न्यूनतम आयु का निर्धारण

निष्कर्ष :- उपरोक्त के आधार पर यह कहा जा सकता है कि हिंदू विवाह ना तो पूर्णता संविदा है और ना ही पूर्णता संस्कार यह अंशता संविदा एवं संस्कार का मिलाझुला रूप है प्राचीन काल में हिंदू विवाह पूर्णता संस्कार था किंतु आगे चलकर आधुनिक समय में विधवा पुनर्विवाह अधिनियम 1856, हिंदू विधि अधिनियम 1955,हिंदू विधि अधिनियम संशोधन अधिनियम 1977, 1978 में संविदा के तत्वों को आंशिक रूप से सम्मिलित किया गया है फिर भी यह पूर्णता संविदा नहीं है

मुख्य परीक्षा में निम्नलिखित प्रकार से प्रश्न पूछे जा सकते हैं

1. क्या हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की पृष्ठभूमि में हिंदू विधि के इस कथन को कि हिंदू विवाह एक संस्कार है संविदा नहीं तर्कसंगत माना जा सकता है? यदि नहीं तो इस अधिनियम द्वारा किए गए क्रांतिकारी परिवर्तनों पर आलोचनात्मक टिप्पणी लिखिए

2.हिंदू विधि के अंतर्गत विवाह की अवधारणा निश्चित कीजिए हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के द्वारा इसकी मूल अवधारणा में क्या परिवर्तन किए हैं?

3.हिंदू विवाह एक संस्कार है संविदा नहीं कथन पर एक समालोचनात्मक निबंध लिखिए

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