Adv. Himani Sharma answer

New Delhi :- न्यायिक सेवा मुख्य परीक्षा टेस्ट सीरीज टेस्ट 1 एडवोकेट हिमानी शर्मा ,जुडीशल अस्पिरेट्स के द्वारा लिखा हुआ उत्तर पढ़ें और कमेंट करें

वास्तव में किए गए अपराध को करने के सामान्य आशय में ही संयुक्त दायित्व का सार निहित है व्याख्या कीजिए[The essence of joint responsibility lies in the common intention to committed the offence actually committed. Discuss.]

आपराधिक विधि का एक सामान्य नियम यह है कि ‘’कोई व्यक्ति किसी अपराध का दोषी नहीं ठहराया जाएगा जब वास्तव में उसने वे अपराध किया हो’’ किंतु इस नियम का एक अपवाद भारतीय दंड संहिता 1860 की धारा 34 व 149 में वर्णित सृजनात्मक आपराधिकता या सम्मिलित दायित्व है

जहाँ एक व्यक्ति को उन कार्यों के लिए भी दोषी ठहराया जाता है जो उसने स्वयं नहीं किए हैं बल्कि कुछ व्यक्तियों के साथ मिलकर किए कार्यों में सहयोग किया  ऐसी स्थिति में उसका दायित्व उन साथियों के समान होगा

संयुक्त दायित्व का सिद्धांत : भारतीय दंड संहिता 1860 की धारा 34  संयुक्त  दायित्व के सिद्धांत को प्रतिपादित करती है

यदि दो या दो से अधिक व्यक्ति किसी कार्य को संयुक्त रूप से करते हैं तो ऐसा माना जाएगा कि उनमें से प्रत्येक ने उस कार्य को व्यक्तिगत रूप से अर्थात अकेले ने किया है

संयुक्त दायित्व सिद्धांत के अनुसार यदि एक बार यह स्थापित हो जाए कि किसी अपराधी कार्य को करने में सामान्य आशय था तो धारा 34 तुरंत लागू हो जाती है

नोट :- धारा 34 वास्तविक अपराधी और अपराध करने में सामान्य आशय को अग्रसर करने के लिए उसके सहयोगियों में कोई अंतर नहीं मानती भले ही अपराध करने में किसी का कितना ही सहयोग रहा हो

धारा 34 उद्देश्य :- यह धारा ऐसे मामलों को निपटाने के लिए जिसमें किसी दल के व्यक्तिगत सदस्यों के कार्यों को अलग-अलग करना या यह साबित करना कठिन हो कि उनके सामान्य आशय को अग्रसर करने में प्रत्येक व्यक्ति ने कितना भाग लिया था

भारतीय दंड संहिता 1860 धारा 34 – सामान्य आशय को अग्रसर करने में कई व्यक्तियों द्वारा किया गया कार्य

जब कोई अपराध कार्य कई व्यक्तियों द्वारा अपने सबके सामान्य आशय को अग्रसर करने में किया जाता है तब ऐसे व्यक्तियों में से हर व्यक्ति उस कार्य के लिए उसी प्रकार दायित्वधीन है मानो वह कार्य अकेले उसी ने किया हो

गोराचंद गोपी 1860 बी.एन.आर.443

गणेश सिंह बनाम राम पूजा 1869.  वी.एल.आर.44 पीसी

पदवली – अपने सबके के सामान्य आशय को अग्रसर करने में उपरोक्त वाद के निर्णय से प्रभावित होकर सन 1870 के संशोधन अधिनियम द्वारा धारा 34 में जोड़ी गई उससे पहले यह मूल संहिता में नहीं थी

उदाहरण : अ ब और , की हत्या की योजना बनाते हैं और उसे मार डालते हैं की हत्या के लिए तीनो संयुक्त रूप से दोषी होंगे मृत्यु का कारण भले  द्वारा पहुंचाई गयी चोट हो

सिद्धांत

  • धारा 34 केवल साक्ष्य का नियम है
  • स्वयं में कोई अपराध नहीं है
  • कोई सजा नहीं बताई गई है
  • किसी दूसरे अपराध के साथ लगाई जाती है

आवश्यक तत्व : संयुक्त दायित्व के सिद्धांत को आकर्षित करने के लिए निम्नलिखित तत्व आवश्यक है

एक आपराधिक कार्य

एक से अधिक व्यक्तियों द्वारा किया गया हो

सभी के सामान्य आशय को अग्रसर करने में किया गया हो

सामान्य आशय पूर्व निर्धारित योजना के अंतर्गत होना चाहिए

मस्तिष्क का मिलन

सभी का अपराध में शामिल होना आवश्यक है

अपराध घटित होते समय सभी व्यक्तियों की उपस्थिति

सभी व्यक्तियों की सभी मामलों में उपस्थिति हमेशा आवश्यक नहीं होती

सामान्य आशय एक ही इरादे के साथ दो से अधिक व्यक्तियों का एक समान इरादा होना

जब किसी कार्य में लगे हुए सभी व्यक्ति पहले से ही योजना बनाकर एक ही आशय के लिए कार्य करते हो तो सामान्य आशय कहा जाता है

पूर्व निर्धारित योजना –  पूर्व सम्मिति या विचारों का आदान-प्रदान,

मस्तिष्क का मिलन एक दूसरे के विचारों से सहमत,

पूर्व विचार विमर्श

पाण्डुरंगा बनाम हैदराबाद राज्य ए.आई.आर 1955 एस.सी 216

इस वाद में उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि सामान्य आशय के लिए पूर्व निर्धारित योजना आवश्यक है योजना चाहे अचानक/ तत्काल तैयार हुई हो , मिलन कितनी जल्दी व कभी भी हो सकता है

महबूब शाह बनाम हिंदू वाद ए.आई.आर 1945 पी.सी 118

इस मामले में अभी निर्धारित किया कि सामान्य में योजना के शामिल सभी व्यक्तियों के मस्तिष्क का पूर्व मिलन आवश्यक है

वीरेंद्र कुमार घोष बनाम एम्पर शांकरी टोला वाद ए.आई.आर 1952 पी.सी

यह अभिनिर्धारित किया गया कि वह लोग भी अपराध में सहयोग करते हैं जो केवल बाहर खड़े होकर इंतजार करते हैं

सामान्य अनुमान का प्रश्न है सामान्य आशय ,भागीदारी सिद्ध करना आवश्यक है

जयभगवान बनाम स्टेट ऑफ हरियाणा 2002 सीआरएलजे 4102 सुप्रीम कोर्ट

सामान्य घटनास्थल पर भी उत्पन्न हो सकता है- ऑन द स्पॉट

ऋषिदेव पाण्ड्य बनाम यूपी ए आई आर 1955 एस सी

  • शारीरिक उपस्थिति व सक्रिय भागीदारी कब जरूरी है

श्रीकांतीया बनाम मुंबई राज्य में यह कहा गया कि

धारा 34 लागू होने के लिए जरूरी है कि

अभियुक्त घटनास्थल पर मौजूद हो

अपराध करने में हिस्सा लिया हो

यह आवश्यक नहीं है कि उसी कमरे में उपस्थित है  जहां अपराध घटित हुआ परंतु यह आवश्यक है कि वह घटना के इतना नजदीक हो जिसे दरवाजे पर खड़ा होकर रखवाली करना सड़क पर चौकसी करना जिससे आने वाले खतरे की सूचना अपने साथी को दे सके

जे.एम.देसाई बनाम मुंबई राज्य ए आई आर 1960 एस.सी 889

सयुंक्त दायित्व के सिद्धांत को लागू करने के लिए शारीरिक उपस्थिति के मामले में जरूरी होती है संपत्ति के मामलों में नहीं

बिशय के अनुसार [बिशय जे. पी क्रि. ला. ] अपराध में संयुक्त दायित्व का सिद्धांत यह है कि

जब दो या दो से अधिक व्यक्ति किसी आपराधिक कार्य को करने के लिए एक होते हैं अलग अलग या एक साथ कार्य करते हैं तो प्रत्येक व्यक्ति जिसने अपराध में सहयोग किया था विधि के अधीन संपूर्ण कार्य के लिए उसी प्रकार उत्तरदाई होगा जैसे उसने स्वम् ही उस कार्य को किया हो अत: स्पष्ट है कि वास्तव में किए गए अपराध को करने के सामान्य आशय में ही संयुक्त दायित्व का सार निहित है

 

 

 

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