न्यायिक सेवा मुख्य परीक्षा टेस्ट सीरीज टेस्ट 4, एडवोकेट यशिका सोनी जुडीशल अस्पिरेट्स के द्वारा लिखा हुआ उत्तर पढ़ें और कमेंट करें

प्रश्न : बलात्कार समाज के प्रति सर्वाधिक घृणित अपराध है परंतु इस कृत्य के लिए सजा का प्रावधान कठोर नहीं जितना होना चाहिए क्या आप बलात्कार के लिए मृत्युदंड का सुझाव देंगे यदि हां तो क्यों? समझाइए

उत्तर: बलात्कार शब्द सुनते ही एक आत्मीय दुख की अनुभूति और एक महिला के लिए यह न एक अपराध वरन उसका शक्ति शारीरिक मानसिक और आत्मा तीनों का ही ह्रास है आंकड़े कहते हैं कि बलात्कार भारत में महिलाओं के खिलाफ किए जाने वाला चौथा सबसे आम अपराध है राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो एनसीआरबी की 2019 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार देश भर में 32037 बलात्कार के मामले दर्ज किए गए इस को औसतन देखा जाए तो 88 मामले प्रतिदिन दर्ज किए गए यह बात गौरतलब है कि यह सिर्फ मामले हैं जो दर्ज किए गए हैं अधिकतर देखा जाता है कि बलात्कार पीड़िता के किसी अपने या जान पहचान के व्यक्ति द्वारा ही किया जाता है इसलिए कई बार परिवार अपनी स्वयं की या जिस व्यक्ति ने उसे अपना रिश्ता या इज्जत बचाने के लिए मामला दर्ज ही नहीं होते हैं

उपरोक्त लिखित तथ्यों से अनुमान लगाया जा सकता है कि जीवन में हर लड़की या स्त्री को कभी ना कभी कार के हालातों से गुजरना ही पड़ता है विरले ही कुछ स्त्रियां होती हैं जो सहमति और बालिग़ होने पर किसी पुरुष द्वारा इस पर की जाती हैं जो यौन उत्पीड़न के मामले राह चलते ही घटित हो जाते हैं उसका तो कोई महत्व ही नहीं बचता है

समाज के प्रति घृणित अपराध है “बलात्कार समाज के प्रति एक घृणित अपराध है” पहली बात मैं कहना चाहूंगी कि बलात्कार नहीं बलात्कारी भावना जो कि पुरुषों किसी की महिलाओं को अपनी एक कामवासना की वस्तु समझकर सहज ही यह भावना उसके मन में उत्पन्न हो जाती है

इसके लिए निर्बन्ध का कोई प्रयास नहीं किया जाता और ना ही इस पुरुष प्रधान समाज में यह बताया जाता है एक महिला भी उनकी ही तरह मनुष्य है उसकी शरीर की बनावट भले ही अलग हो लेकिन उसके मस्तिष्क में किए अपराध जो उसके साथ कारित किया गया है एक पुरुष की अपेक्षा बहुत अधिक होता है

सच है समाज में इसे घृणित कहा जाता है और यह वाक्य सिर्फ एक महिला के लिए घृणित है इसका प्रभाव केवल एक महिला के जीवन और शरीर पर होता है पुरुषों को इसका कोई भूक्तमान नहीं भुगतान पड़ता हजारों लाखों में से ही किसी एक अपराधी को ही सजा समय रहते दी जाती है वरना अधिकतर अपराधी तो बच कर निकल जाते हैं और सुखमय होकर अपना जीवन व्यतीत करते हैं

यह बात घृणित है कि अपराधी बच जाता है और समाज के लिए इसे घृणित क्या होगा जहां पीड़ित के लिए न्याय नहीं और अपराधी को सजा नहीं”

विधिक प्रावधान भारतीय दंड संहिता 1860 की धारा 375 में बलात्कार को परिभाषित किया गया है तथा अधिनियम की धारा 376 की उपधाराएं जो इस प्रकार है जैसे धारा 376 क 376 ख 376 ग 376घ,376घ(क) 376घ (ख)और 376 डं इसमें बलात्कार को सभी स्तर पर जो भी संभावित परिस्थितियां हो सकती हैं उन्हें ध्यान में रखते हुए दंड का प्रावधान किया गया है

लेकिन उत्तर की शुरुआत में हम जिन आकड़ो को पाते हैं क्या उससे यह प्रतीत होता है कि इस अपराध को इस हद तक दंडित बनाया गया है या दंड के प्रावधान हैं

इतना सब होने के बाद भी ऐसा इसलिए है क्योंकि अपराध बहुत हद तक तो सामने आते ही नहीं और यदि सामने आते भी हैं या तो सजा मिलने तक बहुत विलंब हो जाता है या अपराधी को सजा हो ही नहीं पाती 

क्या कामभावना इतनी प्रबल है कि मनुष्य को मनुष्य रहने ही नहीं देती मेरा मानना है कि जो इस तरह के अपराधों को कारित करता है वह मनुष्य नहीं पागल हो हिंसक जानवर है दंड के प्रावधान कठोर होने  मात्र से प्रभाव नहीं पड़ता ही यह सभी जानते हैं कि हत्या के अपराध में मृत्यु दंड है तो क्या हत्या होना बंद हो गई या किसी की दंड का भी उतना है कि अपराध रोक दे किस हद तक यह है कि दंड का भय होता है लेकिन फिर अपराध जो कार्य करते हैं उन्हें कानून का भय नहीं होता है लेकिन इन्हें बचा लेने वाले भी बहुत से लोग हैं यह उन्हें पता होता है समाज में केवल बलात्कारी ही बलात्कार नहीं करता उसके पीछे बहुत से असामाजिक तत्व होते हैं जिनकी आड़ लेकर वे यह करता है और बिना भय के करता है

मृत्यु दंड का सुझाव : प्राचीन काल से ही अपराधों के लिए दंड का प्रावधान है कुछ में कठोर कुछ में सामान्य दंड का प्रावधान है मेरा मानना है हां कि बलात्कार के लिये मृत्युदंड होना चाहिए क्योंकि जो व्यक्ति किसी अन्य के जीवन और उसकी मानवता को नहीं समझता उसे मात्र साधन मानता है और मात्र अपनी एक भावना नहीं दुर्भावना को पूर्ण करने के लिए वे मानव से जानवर बन जाता है उसके लिए मृत्युदंड बिल्कुल सही है ताकि दोबारा ना ऐसा करें ना समाज में इस घृणित कहे जाने वाले अपराध को होने दे लेकिन यह विचार और है कि केवल दंड का प्रावधान किसी अपराध को समाप्त करने में सक्षम नहीं है मनुष्य कैसा प्राणी है जिसमें अच्छाइयां हैं तो बुराई अभी बहुत है इसलिए दंड के माध्यम से वरन मनुष्य पुरुषों में इस भावना का आना कि प्रभावित करता है

इसलिए मेरा विचार है दण्ड के साथ-साथ समाज में एक स्वस्थ भावना का उद्गार हो वह भी अति महत्वपूर्ण है

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